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मतेया खास गाँव के स्कूल के पास श्मशान घाट की डरावनी कहानी | खिड़की के उस पार (काल्पनिक हॉरर स्टोरी)

कहानी के लेखक :- राम सैनी

बिहार के गोपालगंज जिले के मतेया खास गाँव में स्कूल के पास एक श्मशान घाट था। दिन में वहाँ बच्चों की आवाज़ें गूँजती थीं, लेकिन जैसे ही शाम ढलती, पूरा इलाका सन्नाटे में डूब जाता था। गाँव के बुजुर्ग अक्सर कहते थे कि रात के बारह बजे के बाद उस श्मशान घाट के आसपास कोई नहीं जाता। कई लोग इसे अंधविश्वास मानते थे, तो कई लोग दावा करते थे कि उन्होंने वहाँ अजीब घटनाएँ देखी हैं।

इसी गाँव में रहने वाले 21 वर्षीय रवि कुशवाहा और उसका दोस्त पप्पू कुशवाहा इन बातों पर कभी विश्वास नहीं करते थे। दोनों अक्सर गाँव के चौक पर बैठकर लोगों की भूत-प्रेत वाली कहानियों का मज़ाक उड़ाते थे।

एक दिन शाम को दोनों स्कूल के मैदान में बैठे थे। तभी गाँव के एक बुजुर्ग वहाँ आए और बोले, "बेटा, आज अमावस्या की रात है। स्कूल के पीछे वाले श्मशान घाट की तरफ मत जाना।"

रवि हँसते हुए बोला, "चाचा, अब जमाना बदल गया है। भूत-प्रेत जैसी कोई चीज़ नहीं होती।"

बुजुर्ग मुस्कुराए और बोले, "ठीक है, लेकिन अगर हिम्मत है तो आज रात बारह बजे जाकर देख लेना।"

बस, यही बात रवि और पप्पू के दिल में बैठ गई।

रात के साढ़े ग्यारह बजे दोनों अपने-अपने घर से चुपके से निकले। हाथ में एक टॉर्च, मोबाइल और एक डंडा था। आसमान में काले बादल छाए थे और हल्की-हल्की हवा चल रही थी।

जैसे ही दोनों स्कूल के पास पहुँचे, वहाँ का माहौल बिल्कुल अलग था। दिन में जहाँ बच्चों की हँसी सुनाई देती थी, वहीं अब केवल झींगुरों की आवाज़ और पेड़ों की सरसराहट सुनाई दे रही थी।

स्कूल के पीछे कुछ ही दूरी पर श्मशान घाट था। वहाँ एक विशाल पीपल का पेड़ खड़ा था, जिसकी टहनियाँ हवा में झूल रही थीं।

पप्पू ने धीरे से कहा, "यार... जगह तो सच में डरावनी लग रही है।"

रवि बोला, "डर मत, बस थोड़ी देर रुकते हैं।"

दोनों श्मशान घाट के अंदर पहुँचे ही थे कि अचानक उनकी टॉर्च बंद हो गई।

"अरे! अभी तो नई बैटरी डाली थी," रवि ने कहा।

उसने टॉर्च को थपथपाया और वह फिर जल उठी।

दोनों ने राहत की साँस ली।

तभी उन्हें ऐसा लगा जैसे किसी ने उनका नाम पुकारा हो।

"रवि..."

दोनों एकदम रुक गए।

चारों तरफ सन्नाटा था।

पप्पू ने काँपती आवाज़ में पूछा, "तूने सुना?"

रवि ने हाँ में सिर हिलाया।

दोनों ने आवाज़ की दिशा में टॉर्च घुमाई, लेकिन वहाँ कोई नहीं था।

कुछ देर बाद फिर वही आवाज़ आई।

"रवि... इधर आओ..."

इस बार आवाज़ पहले से ज्यादा साफ थी।

दोनों के पैरों तले जमीन खिसक गई।

रवि ने हिम्मत करके आगे कदम बढ़ाया।

जैसे ही वे पीपल के पेड़ के पास पहुँचे, अचानक ऊपर बैठे उल्लू ने ज़ोर से आवाज़ निकाली।

पप्पू डर के मारे उछल पड़ा।

रवि हँसने लगा।

"यही है तेरा भूत?"

दोनों ने राहत की साँस ली।

लेकिन तभी तेज़ हवा चली और पास में रखा एक पुराना बाँस ज़मीन पर गिर पड़ा।

धड़ाम...

आवाज़ इतनी तेज़ थी कि दोनों घबरा गए।

अब उन्हें सचमुच डर लगने लगा था।

तभी रवि के मोबाइल पर एक अनजान नंबर से मैसेज आया—

"वापस चले जाओ..."

रवि ने पप्पू को मैसेज दिखाया।

दोनों हैरान थे।

उन्होंने आसपास देखा।

कोई नहीं था।

उन्होंने उस नंबर पर कॉल किया।

लेकिन जवाब आया—

"यह नंबर मौजूद नहीं है।"

अब दोनों की धड़कन तेज़ हो चुकी थी।

तभी दूर सफेद कपड़ों में कोई आकृति दिखाई दी।

वह धीरे-धीरे उनकी ओर बढ़ रही थी।

पप्पू चिल्लाया, "भाग रवि!"

दोनों पूरी ताकत से भागने लगे।

भागते-भागते रवि गिर गया।

उसने पीछे मुड़कर देखा।

वह सफेद आकृति अब बिल्कुल पास थी।

रवि ने आँखें बंद कर लीं।

कुछ सेकंड बाद जब उसने हिम्मत करके आँखें खोलीं तो सामने गाँव का चौकीदार खड़ा था।

उसने सफेद बरसाती पहन रखी थी।


चौकीदार बोला, "तुम दोनों यहाँ क्या कर रहे हो?"

दोनों ने पूरी बात बता दी।

चौकीदार मुस्कुराया और बोला, "रात के अंधेरे में हर सफेद चीज़ भूत नहीं होती।"

दोनों ने राहत की साँस ली।

लेकिन तभी चौकीदार ने एक बात कही—

"वैसे... अभी थोड़ी देर पहले यहाँ तुम दोनों के अलावा कोई तीसरा भी खड़ा था।"

रवि और पप्पू ने एक-दूसरे की तरफ देखा।

"कौन?"

चौकीदार बोला, "पता नहीं... जैसे ही मैं टॉर्च लेकर इधर आया, वह अंधेरे में गायब हो गया।"

अब तीनों ने चारों तरफ टॉर्च घुमाई।

लेकिन वहाँ कोई नहीं था।

डरे हुए रवि और पप्पू तुरंत गाँव लौट आए।

अगली सुबह उन्होंने सारी बात गाँव वालों को बताई।

कुछ लोग हँसने लगे।

कुछ लोग चुप हो गए।

बुजुर्ग केवल इतना बोले—

"हर बात का जवाब इंसान के पास नहीं होता।"

उस दिन के बाद रवि और पप्पू ने कभी भी रात में स्कूल के पीछे बने श्मशान घाट की तरफ जाने की हिम्मत नहीं की।

आज भी जब मतेया खास गाँव में रात के समय तेज़ हवा चलती है और स्कूल के पीछे से अजीब आवाज़ें सुनाई देती हैं, तो लोग उस रास्ते से अकेले नहीं गुजरते।

क्योंकि कुछ कहानियाँ सच हों या झूठ...

उनका डर लोगों के दिलों में हमेशा ज़िंदा रहता है।

(यह कहानी पूरी तरह काल्पनिक है और केवल मनोरंजन के उद्देश्य से लिखी गई है।)


डिस्क्लेमर (Disclaimer)

अस्वीकरण: यह कहानी पूर्णतः काल्पनिक है। कहानी में प्रयुक्त सभी पात्र, घटनाएँ, स्थान और संवाद लेखक की कल्पना की उपज हैं। इसका उद्देश्य केवल पाठकों का मनोरंजन करना है।

इस कहानी का उद्देश्य किसी भी प्रकार के अंधविश्वास, भूत-प्रेत, टोना-टोटका या गैर-वैज्ञानिक मान्यताओं को बढ़ावा देना या उनका समर्थन करना बिलकुल नहीं है। कहानी में किसी भी गाँव, स्थान, जाति, धर्म या समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुँचाने की कोई मंशा नहीं है। यदि कहानी का कोई प्रसंग, घटना या नाम वास्तविक जीवन की किसी घटना या जीवित/मृत व्यक्ति से मेल खाता है, तो इसे मात्र एक संयोग समझा जाए।

पाठकों से अनुरोध है कि वे इसे केवल एक मनोरंजक कथा के रूप में ही पढ़ें और इसमें वर्णित बातों पर आँख बंद करके विश्वास न करें। वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाएँ और किसी भी प्रकार की अफ़वाहों या अंधविश्वासों से दूर रहें। 

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